
Zomato और Swiggy पर अब हर साल लगभग ₹180-200 करोड़ का अतिरिक्त गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) बोझ पड़ने वाला है, जो हाल ही में जीएसटी काउंसिल की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बाद लागू होगा। अपनी 56वीं बैठक में जीएसटी काउंसिल ने स्पष्ट किया कि फूड डिलीवरी प्लेटफ़ॉर्म्स को अब सीजीएसटी एक्ट की धारा 9(5) के तहत डिलीवरी शुल्क पर 18% जीएसटी देना होगा। पहले ये शुल्क केवल गिग वर्कर्स को भुगतान किए जाने वाले “पास-थ्रू अमाउंट” माने जाते थे और इन्हें प्लेटफ़ॉर्म की आय का हिस्सा नहीं माना जाता था। यह स्पष्टीकरण फूड डिलीवरी एग्रीगेटर्स के लिए अनुपालन ढांचे को और सख्त बनाता है और उन्हें उन सेवाओं पर जीएसटी जमा करने के लिए बाध्य करता है जिन पर पहले विवाद था या जिनकी व्याख्या ढीली-ढाली थी।
वित्तीय प्रभाव: ₹180-200 करोड़ सालाना
विश्लेषकों का अनुमान है कि इस बदलाव से दोनों कंपनियों को हर साल लगभग ₹180-200 करोड़ का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा।
प्रति ऑर्डर लागत का अनुमान
विस्तृत गणना से पता चलता है कि औसत डिलीवरी शुल्क के आधार पर, Zomato को प्रति ऑर्डर लगभग ₹2 और स्विगी को प्रति ऑर्डर ₹2.6 का असर पड़ेगा। वहीं, Swiggy का क्विक कॉमर्स बिज़नेस “Instamart” पर इसका असर अपेक्षाकृत कम होगा – यानी प्रति ऑर्डर ₹1 से भी कम। खास बात यह है कि Blinkit जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स, जो पहले से ही डिलीवरी को जीएसटी योग्य राजस्व मानते हैं, पर अतिरिक्त असर नहीं पड़ेगा।
कंपनियों की प्रतिक्रिया
कंपनियों के लिए यह बदलाव कर देनदारियों (tax liabilities) में बड़ा इज़ाफा है। चूंकि दोनों ही प्लेटफ़ॉर्म पहले से ही कम मुनाफे के मार्जिन पर काम करते हैं, इसलिए इनके लिए इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन करना मुश्किल होगा। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह अतिरिक्त जीएसटी बोझ या तो ग्राहकों पर बढ़ी हुई डिलीवरी फीस के रूप में डाला जाएगा या फिर अप्रत्यक्ष रूप से डिलीवरी वर्कर्स की इंसेंटिव राशि में कटौती की जाएगी। सरल शब्दों में, ग्राहकों को अब थोड़ा सा ज्यादा बिल चुकाना पड़ सकता है, जबकि डिलीवरी पार्टनर्स की कमाई घट सकती है अगर कंपनियां आंतरिक रूप से लागत संतुलित करने का रास्ता चुनती हैं।
इसके अलावा, विश्लेषकों का यह भी कहना है कि प्लेटफ़ॉर्म्स नई लेवी (levy) या सुविधा शुल्क (convenience fee) लगाने की संभावना तलाश सकते हैं ताकि टैक्स का बोझ कम किया जा सके। लेकिन इससे ऑर्डर की आवृत्ति (order frequency) पर असर पड़ सकता है, खासकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में, जहाँ अब भी विकास की बड़ी संभावना है लेकिन ग्राहकों का बजट सीमित रहता है।
व्यापक संदर्भ और अनुपालन प्रभाव
- कानूनी स्पष्टता: इस फैसले ने लंबे समय से चल रहे इस विवाद को समाप्त कर दिया है कि क्या डिलीवरी वर्कर्स को दी जाने वाली फीस पर जीएसटी लागू होता है।
- कर विवाद: ज़ोमैटो को पहले ही 2019 से 2022 के बीच संभावित कम भुगतान के लिए ₹803 करोड़ का जीएसटी नोटिस मिल चुका है; वहीं स्विगी को इसी अवधि के लिए ₹327 करोड़ का नोटिस मिला था।
- सेक्टर का परिदृश्य: भले ही लागत का दबाव वास्तविक है, कुछ ब्रोकरेज हाउस अब भी विकास को लेकर आशावादी हैं। उनका मानना है कि यदि कंपनियां मार्जिन को सही ढंग से प्रबंधित करती हैं, तो 2026-27 तक प्लेटफ़ॉर्म्स 21-23% की डिलीवरी वृद्धि बनाए रख सकते हैं।
निष्कर्ष
संक्षेप में, जीएसटी काउंसिल का यह स्पष्टीकरण, जिसका उद्देश्य टैक्स पारदर्शिता और अनुपालन को बेहतर बनाना है, भारत के प्रमुख फूड डिलीवरी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। इसका असर केवल कंपनियों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि रेस्टोरेंट्स, डिलीवरी पार्टनर्स और उन लाखों ग्राहकों पर भी होगा जो हर दिन इन सेवाओं पर निर्भर रहते हैं।
